Monday, November 28, 2011

. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .आस


मोहि आस नहीं काऊ ईश्वर की, 
मोहि आस नहीं काऊ रहवर की,
हमने सब खुद ही सीखो है, 
मोहि आस नहीं काऊ गुरुवर की!

मेरे जो बाहिर सो मन में होई, 
मेरी नैया चाहि सघन में होई, 
दोई रोटी नून गुजर मेरी, 
मोहि आस नहीं सिंघासन की!

मोहि ह्रदय तिहारे रख लीजो, 
मोरे अंतर मन श्रृंगार रचो, 
मोरी बांह पकरि  बस हंस दीजो, 
मोहि आस नहीं तन की, धन की!

मेरे जीवन अंत निकट रहियो, 
हो नियरे, चाहि दूर रहो, 
मोरे नैना अस्त तुम्हें देखें, 
हैं येही आस मेरे मन की !

Monday, October 3, 2011

. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .वजूद


सब कुछ यही था, 

सब कुछ वही है, 
बस तुम कुछ कम हो, 
तुम्हारा वजूद कुछ कम है,

अपने वजूद को तराजू में रख कर,
तुमने बेचा कोडियों में,
कुछ हिस्से को काटा,
कुछ को फेका,
कुछ को कुर्बान किया किसी की पोड़ियों में,
और अब के जब तुम कुछ कम हो, 
दिखते भी कुछ अलग से हो,
तो अफ़सोस क्यों?

वजूद गर कमीज़ होता, 
एक हिस्सा फाड़ के बेचा होता, 
रफू कर देते,
वजूद जो मिटटी होता,
कुछ खोद के बेचा होता, 
तो फिर भर देते,
पर वजूद तो यकीन था,
गया तो गया,
अब आस लगाये बैठे रहो,
कि कभी कोई बिसराती आये, 
और दस गुने भाव पर ही सही,
पर तुम्हारा खोया वजूद,
तुम्हें वापस दे जाये, 
तब तक इसी आधे वजूद के सहारे जियो, 
जो कुछ यकीन पैमाने में बाकी है,
पानी मिला-मिला के पियो, 

बाकी तो येही सब था, 
येही सब है,
येही सब रहेगा, 
बस तुम कुछ कम होगे, 
तुम्हारा वजूद कुछ कम होगा!!

Thursday, August 18, 2011

. . . . . . . . . . .तुम और तुम्हारी खिलखिलाहट


तुम और तुम्हारी खिलखिलाहट, 
और कुछ खामोश पल, 
जैसे सर्दियों में खिली धूप,
और जगजीत की पुरानी ग़ज़ल,

इन्हीं सर्दियों में हम छज्जे पे खड़े चाय की चुस्कियां ले रहे हों, 
और तुम टीवी पर "छज्जे छज्जे का प्यार" देखो, 
दूर कहीं रेडियो पर "सिलसिले" के गीत चल रहे हों, 
और तुम यूँही मेरी तरफ एक बार देखो,

फिर इसी बीच वो तुम्हारा फिर से  बेवजह खिलखिलाना, 
मेरा अगली चुस्की को रोकते हुए तुम्हें देखना,
कुछ  सोचना,
और कहना,
"कि थोड़ी खिसकी है"

फिर अगली चुस्की के साथ,
वो खिलखिलाहट, वो खामोश पल,
वो खिली धूप, वो पुरानी ग़ज़ल, 
को पी जाना,
और मन ही मन ये सोचना,
"कि ज़िन्दगी हसीन है" 

Wednesday, August 10, 2011

. . . . . . . . . . . . . .पथिक हूँ में, पथिक हूँ में!


पथिक हूँ में, पथिक हूँ में,


मुझे ना चाह मंजिल की,
मुझे ना दूरियों से रोष,
ना कुछ पाने का है उल्लास,
ना कुछ खो जाने का अफसोस,
मेरी बस एक अभिलाषा,
उसी को में समर्पित हूँ,

पथिक हूँ में, पथिक हूँ में!

कभी जो राह में भूलूं,
तो अपना भाग्य में मानूं, 
कहूँ जो भी, करूँ जो भी,
स्वयं का अंश में जानूं,
धरीधर सा हठी में हूँ,
में हूँ निर्भय पवनसुत सा,

पथिक हूँ में, पथिक हूँ में!

हरेक साथी है साधू सा,
हरेक पथ योग सा मुझको,
मुझे बस बहना आता है, 
ठहरना रोग सा मुझको,
में प्रेमी हूँ हरेक पथ का,
हरेक पथ मेरा मुर्शिद है,

पथिक हूँ में, पथिक हूँ में! 

Wednesday, August 3, 2011

. . . . . . . . . . . . . . . . . .सुबह





बेजान ख्यालों के दिन,
अपाहिज सपनों की रात,
कहती है तुमसे कुछ बात!!


कि उठो, जागो,
और हमें भी जगाओ,
ज़िन्दगी अभी जिंदा है,
ये अहसास,
हमें भी कराओ,


हम अपाहिज हैं, तो क्या है?
तुम खुद को पंख लगा के,
हमको भी साथ उडाओ,


ओदे कोयले कि तरह मत सुलगो,
जो बस धुंआ छोड़े, आंसू बहाये,
जलो तो ऐसे जलो,
कि बर्बादी तो हो,
पर अँधेरा मिट जाये,


सुबह से कुछ सीखो,
हरेक रात को वो खुद को भूल जाती है,
हर सुबह, वो फिर से,
एक नयी सुबह बन के आती है,
हर सुबह,
मांगे तुम्हारा साथ,
हर सुबह,
कहती है तुमसे कुछ बात!!

Sunday, July 24, 2011

. . . . . . . . . . . . . . . . .कैसी हो तुम!

कैसी हो तुम,
कैसी हो तुम!

अनजान, अनमोल, अनछुई सी,
ओस से भीगी कली सी,
या किसी सौम्य, सहर्ष, सहज, स्वछन्द, मुस्कान सी,
खुद से ही अलग कैसी हो तुम!

मुझको एक इन्सां बनाकर,
स्वच्छ, निश्छल, निष्कपट, निश्वार्थ भावानायेँ, मन में जगाकर,
ईश्वर के नितांत समीप लाकर,
लौट गई, चली गई या मुड़ गई, 
फिर किसी को बनाने एक इन्सान जैसा, 
शायद मुझसे भी अच्छा, और कुछ भगवान जैसा,
जो तुम्हे समझे और समझो उसे तुम,
फिर न हो ये बात, ये अहसास 
के कैसी हो तुम,
आज भी में सोचता हूँ, चाहता हूँ,
के सुनू में, या के पूछूँ, या कहूँ,
कैसी हो तुम, कैसी हो तुम!!

Saturday, July 16, 2011

. . . . . . . . . . . . . . . .बारिश वही है


बारिश वही है,
मगर कुछ नया है!

ऐसे तो ना दो बूँद गिरने पे,
चिड़ियों से चहचहाते थे हम,
चुपचाप, यूँही, अकेले में,
बेवजह न मुस्कुराते थे हम,
वो नुक्कड़ की चाय में भी,
पहले ऐसी बात न थी,
मिटटी की महक भी,
पहले इतनी खास न थी!

बारिश तो वही है,
मगर कुछ नया है!

मन तो जैसे पानी से,
सूखा ही रहता था,
कुछ खीझा सा रहता था,
रूखा ही रहता था,
पर अब तो लगता है,
मन को किसी ने मदिरा पिला दिया हो,
गीले गर्म गुड़ में,
किसी ने तिल मिला दिया हो!
बारिश वही है,
मगर कुछ नया है!
बारिश वही है,
बस तुम आ गयी हो!!
(Written while it was still raining)